वैराग्य को धारण करना आसान होता तो हर कोई वैरागी ही होता

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्णयम् ।।

सूत्र 1.16
वैराग्य को धारण करना आसान होता तो हर कोई वैरागी ही होता। पर इसकी मुश्किल और जटिलता ही है जो कुछ ही लोग इसको जान पाते हैं।
वैराग्य का अर्थ है किसी एक उद्देश्य की और बढ़ना और बाकी सभी उद्देश्य से विमुख हो जाना। जब आप को केवल अपना उद्देश्य ही दीखता है और कुछ नहीं दीखता है तब आप वैरागी हो गए। कई बार इसको आपने मह्सुश किया होगा की आप किसी काम में इतना रम गए की सब कुछ भुला बैठे। बच्चे खेलने में लग जाते हैं तो उनको कुछ याद ही नहीं रहता खेल के अतिरिक्त। उसी तरह एक विद्यार्थी जब पढ़ने में लग जाता है और खाना पीना भी भूल जाता है तब आप वैराग्य की झलक देख पाते हैं। उसी तरह एक जुवारी जुआ खेलता है तो पूरी दुनिया भूल जाता है ताश के पत्तों के अलावा कुछ याद नहीं रहता है।
इन सभी घटनाओ में यही मालूम होता है की वैराग्य तो कही न कही कभी न कभी हम सभी को प्राप्त होता ही है। परंतु यह क्षणिक होता है और जीवन के बड़े उद्देश्यों के सामने दिशा से भटकाव ही बढ़ाता है।
जो अंतिम सत्य है उसमे वैराग्य स्थापित हो जाये तो ते ये पर वैराग्य कहलाता है। इसमें उस अंतिम सत्य जिसे आप भगवन या परमात्मा कहते हैं उसमे ध्यान लगाया जाता है। पतंजलि ऋषि ने अपने योग सूत्रों में उसे परम पुरुष कहा है। यहाँ पुरुष का अर्थ स्त्री पुरुष वाले पुरुष से नहीं लगाएं।
तो यही हमारे सवाल का जवाब भी है की वैराग्य कैसे प्राप्त हो। वैराग्य प्राप्त करने के लिए परम पुरुष परमात्मा को छोड़कर बाकी किसी और पदार्थ की इच्छा का ख़त्म होना है। जीवन में बड़े उद्देश्य हो और आप उसे पूरा करना चाहते हैं तो छोटे उद्देश्य की चिंता नहीं करनी चाहिए। वो तो खुद ही पूरा हो जाएंगे। जीवन को उस बड़े उद्देश्य के लिए तैयार करिये। परम पुरुष पर ध्यान लगाइये। इस से वैराग्य उत्पन्न होगा। और ये वैराग्य आपको विवेक देगा। आप सच जान पाएंगे। आप सही गलत में अंतर कर पाएंगे।
वैराग्य अपर से प्रारम्भ होकर पर वैराग्य पर समाप्त हुआ।
अपर वैराग्य मतलब सभी चीजों से घृणा करना या वितृष्णा हो जाना।
पर वैराग्य मतलब सभी चीजो से घृणा या प्रेम से ऊपर उठ जाना।

पर वैराग्य से विवेक उत्पन्न होता है।
विवेक क्या है वो कल बताता हूँ।

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