सक राजा कौन थे?

सक राजा कौन थे?

शकद्वीपीय ब्राह्मणों को भारतीय कहने पर कई लोग नाराज होकर मेरे पास इस पर बहुत से लेख भेजे। पर किसी भी मूल बात को इन लोगों ने समझने की चेष्टा नहीं की है। ब्रिटिश काल में हर भारतीय चीज को विदेशी सिद्ध करने का प्रयत्न होता रहा है। जैसे राजस्थान के राजपूतों ने भारत की रक्षा के लिए सबसे ज्यादा संघर्ष किया तो उनको शक और हूणों का वंशज सिद्ध करने के लिए कर्नल टाड ने अधिकांश मूल अभिलेख जला कर राजस्थान का इतिहास लिखा। इसी प्रकार अंग्रेज बेचैन थे कि शकद्वीपी ब्राह्मणों ने कभी विदेशी आक्रमणकारियों का साथ क्यों नहीं दिया। अतः इनको विदेशी सिद्ध करने के लिए व्यापक जालसाजी हुयी।

इनकी अज्ञानता कई बातों में बहुत स्पष्ट है-
(1) किसी को अभी तक पता नहीं चला कि शक द्वीप कहाँ है।
(2) किस शक जाति में 4 वर्ण की व्यवस्था थी? आजतक किसी भी भारतीय या विदेशी इतिहासकार को शक, यवन या किसी अन्य देश में चातुर्वर्ण्य व्यवस्था नहीं मिली है। विष्णु पुराण आदि में बहुत स्पष्ट लिखा है कि केवल भारत में ही चातुर्वर्ण्य है। बाहर से काल्पनिक शक ब्राह्मणों का आना वैसा ही है जैसे अनुपलब्ध ग्रीक ज्योतिष की किताबों की भारतीयों द्वारा नकल। बिना मूल के नकल कैसे?
(3) सभी शक जातियां मध्य एशिया तथा दक्षिण यूरोप की थीं। पर शक द्वीप भारत के दक्षिण पूर्व में आस्ट्रेलिया था। मध्य एशिया के आक्रमणकारियों के साथ आस्ट्रेलिया के ब्राह्मण कैसे आ सकते हैं?
(4) मध्य एशिया से आने पर इनका मुख्य केन्द्र पंजाब सिन्ध होता। पर इनका मुख्य केंद्र बिहार तथा पूर्व उत्तर प्रदेश है। शाक्यमुनि का जिस क्षेत्र में प्रचार था वहीं भूमिहार तथा शकद्वीपी ब्राह्मण हैं।
(5) शकद्वीपी के दो अर्थ काम के हिसाब से हैं-
शक का एक अर्थ है दिनों की गणना। इससे जो वार्षिक पञ्चाङ्ग बनाते थे वे शाकद्वीपी हैं।
शाक का अर्थ वनस्पति है। इनसे चिकित्सा करने वाला शाकद्वीपी है।
(6) भारत में चारों तरफ के देशों का सूक्ष्म रूप था जिसकी नकल वे देश करते थे। भारत की कन्याकुमारी का नकल केन्या है। वहां का मोम्बासा मुम्बई की नकल है। भारत के सलेम की नकल जेरूसलेम (जेरू = नया) है।
मलयालम की नकल मलाया, कोवलम तट की नकल कुवालालमपुर है।
चम्पा भागलपुर तथा कम्बोडिया दोनों है। अनाम का अर्थ आन्ध्र का येनाम तथा वियतनाम है।
इसी प्रकार यूकेलिप्टस शक वाले आस्ट्रेलिया का लघु रूप साल शक के वन का शकद्वीप है जहां शाकद्वीपी ब्राह्मण मूल रूप से रहते हैं।
(7) भविष्य पुराण, ब्रह्म खण्ड, अध्याय 139 के अनुसार भगवान् कृष्ण गरुड पर सवार होकर शक द्वीप गये थे। स्पष्टतः यह स्थल भाग से नहीं मिला हुआ था। वाल्मीकि रामायण, किष्किंधा काण्ड, अध्याय 40 के अनुसार मनुष्य राजा गरुड का भवन सप्त-द्वीप (एशिया नक्शे में हाथी की सूंढ जैसा-शुण्डा, इण्डोनेशिया) के पूर्व छोर पर था (पूर्व इण्डोनेशिया या उत्तर आस्ट्रेलिया)। आस्ट्रेलिया भारत के अग्नि कोण में होने के कारण अग्नि या अंग द्वीप भी कहते थे (वायु पुराण, अध्याय 41)। इसका प्रतिरूप भारत का अंग (मगध का पूर्व भाग) था। अंग के पूर्व बंग का प्रतिरूप इण्डोनेशिया के पूर्व उत्तर में काली बंगन है।
(8) इन भ्रमों के कारण हैं-
भारतीय लोगों का विदेशी बनने का शौक–
शक शब्द के अर्थ नहीं जानना-शक जाति भारत से उत्तर पश्चिम में तथा शक द्वीप बिल्कुल उल्टी दक्षिण पूर्व दिशा में—
वेद वर्णित तीन प्रकार के सप्तसिन्धु को केवल एक मानना, उसमें भी 7 नदियों के बदले केवल सिन्धु क्षेत्र को ही पूरा सप्तसिन्धु मानना। केन्द्रीय सप्तसिन्धु बहुत स्पष्ट रूप में वर्णित है जिसका दैनिक पाठ होता है-गंगे यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदा सिन्धु कावेरी—।।पूर्वी सप्तसिन्धु ब्रहमपुत्र से वियतनाम तथा इण्डोनेशिया तक है। पश्चिमी सप्तसिन्धु सिन्ध के पश्चिम अरब तक है।—
भारत के कई स्थान नाम पूर्व तथा पश्चिम में भी हैं। आधुनिक युग में भी अमेरिका में संसार के सभी मुख्य नगरों के नाम पर नगर हैं। प्राचीन क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका) की भी 7 नदियों का नाम सरस्वती था।—
पुराण के भूगोल का अध्ययन करने वालों ने दोनों अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि को भूलकर पूरा संसार एशिया अफ्रीका में फिट कर दिया है।

———
अरुण उपाध्याय

शाक द्वीपीय लोगो के ईरान से वर्तमान भारत में आव्रजन से उनके सनातन वैदिक धर्म के अनिवर्चनीय (Integral) भाग होने की अवस्था पर कोई असर नहीं पड्ता है, हम सब जानते हैं कि ईरान पुरा प्राचीन काल मे वैदिक संस्कृति का हिस्सा था ही, जहां जरथुस्त्र ने एक संकीर्ण अवेस्तन संप्रदाय खडा कर दिया और धीरे धीरे उस क्षेत्र के ब्राहमणो को मूल भारत भूमि आना पडा, सबसे पहले आने वालो मे वशिष्ठ ऋषि ही थे।

ये शाक द्वीपीय लोग ही मागी कहलाने लगे क्योंकि कुछ मायनों मे इनके विश्वास और रीति रिवाज मूल वैदिक धर्म से अलग हो गये थे। ग्रीस और इरान मे ४ वर्णों की स्थिति ऎतिहासिक तथ्य है, गूगल के प्रयोग से जाना जा सकता है।

शकद्वीपीय ब्राह्मण मुख्यतः मगध के थे, अतः उनको मग भी कहा गया है। आज भी मगध के आसपास ही हैं। मग के दो ब्राह्मण विक्रमादित्य काल में जेरूसलेम गये थे जो उस समय रोम के अधीन था। रोमन राज्य तथा विक्रमादित्य राज्य के बीच कोई अन्य राज्य नहीं था। इन लोगों ने ही ईसा के महापुरुष होने की भविष्यवाणी की थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *