आज़ाद की माँ का सच

आज़ाद की माँ का सच जो बताया नही जाता है।

भारत माता के अमर बलिदानी सपूत चंद्रशेखर आज़ाद और उनकी माता की पुण्य स्मृतियों के साथ इस कहानी का जन्म हुआ ! यह कहानी आजाद की शहादत के बाद जन्मी ! यह कहानी हम भारतीयों की कहानी कहती है ! सच की पृष्ठभूमि से भी परिचित हो लीजिये ! इस कहानी का जिक्र करना बेहद आवश्यक इसलिए है क्यूंकि आप इसे समझ सकें कि तब कैसे कैसे लोग थे और आज कैसे कैसे लोग है !

चंद्रशेखर आजाद का क्रांतिकारी जीवन का केंद्र बिंदु झांसी रहा था ! जहाँ क्रांतिकारियों में उनके २-3 करीबियों में से एक सदाशिव राव मलकापुरकर रहते थे ! चंद्रशेखर आजाद अपने जीवन में बहुत अधिक गोपनीयता रखते थे इस कारण वह आजीवन कभी भी पुलिस द्वारा पकडे नहीं गए थे ! उन्हें इसका अहसास था कि उनके साथियों में कुछ कमजोर कड़ी है जो पुलिस की प्रताड़ना पर विश्वसनीय नहीं रह जायेंगे ! लेकिन सदाशिव जी उन विश्वसनीय लोगों में से थे जिन्हें आजाद अपने साथ मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा गाँव ले गए थे और अपने पिता सीताराम तिवारी एवं माता जगरानी देवी से मिलवाया था !

सदाशिव राव आजाद की मृत्यु के पश्चात भी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष करते रहे एवं कई बार जेल भी गए ! आजादी के बाद जब वह स्वतंत्र हुए तो वह आजाद के माता पिता का हालचाल पूछने उनके गाँव पहुंचे ! वहां उन्हें पता चला कि चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत के कुछ वर्षों बाद उनके पिता जी की भी मृत्यु हो गयी थी ! आज़ाद के भाई की मृत्यु भी इससे पहले ही हो चुकी थी ! अत्यंत निर्धनावस्था में हुई उनके पिता की मृत्यु के पश्चात आज़ाद की निर्धन निराश्रित वृद्ध माताश्री उस वृद्धावस्था में भी किसी के आगे हाथ फ़ैलाने के बजाय जंगलों में जाकर लकड़ी और गोबर बीनकर लाती थी तथा कंडे और लकड़ी बेचकर अपना पेट पालती रहीं ! लेकिन वृद्ध होने के कारण इतना काम नहीं कर पाती थीं कि भरपेट भोजन का प्रबंध कर सकें ! अतः कभी ज्वार कभी बाज़रा खरीद कर उसका घोल बनाकर पीती थीं क्योंकि दाल चावल गेंहू और उसे पकाने का ईंधन खरीदने लायक धन कमाने की शारीरिक सामर्थ्य उनमे शेष ही नहीं रह गयी थी !

सबसे शर्मनाक बात तो यह कि उनकी यह स्थिति देश को आज़ादी मिलने के 2 वर्ष बाद (1949 ) तक जारी रही ! (यहां आज की पीढ़ी के लिए उल्लेख करना आवश्यक है कि उस दौर में ज्वार और बाज़रा को ”मोटा अनाज” कहकर बहुत उपेक्षित और हेय दृष्टि से देखा जाता था और इनका मूल्य गेंहू से बहुत कम होता था)

सदाशिव राव ने जब यह देखा तो उनका मन काफी व्यथित हो गया ! एक महान राष्ट्र भक्त की माँ दिन के एक वक़्त के भोजन के लिए तरस रही थी ! जब उन्होंने गाँव से कोई मदद न मिलने का कारण पता किया तो पता चला कि चंद्रशेखर आजाद की माँ को एक डकैत की माँ कहकर उलाहना दिया जाता थी और समाज ने उनका बहिष्कार सा किया हुआ था !

आजाद जी की माँ की इस दुर्दशा को देख सदाशिव जी ने उनसे अपने साथ झांसी चलने को कहा परन्तु उस स्वाभिमानी माँ ने अपनी उस दीनहीन दशा के बावजूद उनके साथ चलने से इनकार कर दिया था ! तब चंद्रशेखर आज़ाद जी को दिए गए अपने एक वचन का वास्ता देकर सदाशिव जी उन्हें अपने साथ अपने घर झाँसी लेकर आये थे, क्योंकि उनकी स्वयं की स्थिति अत्यंत जर्जर होने के कारण उनका घर बहुत छोटा था अतः उन्होंने आज़ाद के ही एक अन्य मित्र भगवान दास माहौर के घर पर आज़ाद की माताश्री के रहने का प्रबंध किया था और उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा की ! मार्च १९५१ में जब आजाद की माँ जगरानी देवी का झांसी में निधन हुआ तब सदाशिव जी ने उनका सम्मान अपनी माँ के समान करते हुए उनका अंतिम संस्कार स्वयं अपने हाथों से ही किया था ! अपनी अत्याधिक जर्जर आर्थिक स्थिति के बावजूद सदाशिव जी ने चंद्रशेखर आज़ाद को दिए गए अपने वचन के अनुरूप आज़ाद की माताश्री को अनेक तीर्थस्थानों की तीर्थ यात्रायें अपने साथ ले जाकर करवायी थीं !

अब यहाँ से प्रारम्भ होता है वो खूनी अध्याय जो राक्षसी राजनीति के उस भयावह चेहरे और चरित्र को उजागर करता है जिसके रोम-रोम में चंद्रशेखर आज़ाद सरीखे क्रांतिकारियों के प्रति केवल और केवल जहर ही भरा हुआ था !

चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री के देहांत के पश्चात झाँसी की जनता ने उनकी स्मृति में उनके नाम से एक सार्वजनिक स्थान पर पीठ का निर्माण किया ! प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने इस निर्माण को झाँसी की जनता द्वारा किया हुआ अवैध और गैरकानूनी कार्य घोषित कर दिया था ! किन्तु झाँसी के राष्ट्रभक्त नागरिकों ने तत्कालीन सरकार के उस शासनादेश को महत्व न देते हुए उस पीठ के पास ही चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित करने का फैसला कर लिया था !

मूर्ती बनाने का कार्य चंद्रशेखर आजाद के ख़ास सहयोगी कुशल शिल्पकार रूद्र नारायण सिंह जी को सौपा गया ! उन्होंने फोटो को देखकर आज़ाद की माताश्री के चेहरे की प्रतिमा तैयार कर दी थी ! झाँसी के नागरिकों के इन राष्ट्रवादी तेवरों से तिलमिलाई बिलबिलाई तत्कालीन सरकार अब तक अपने वास्तविक राक्षसी रूप में आ चुकी थी ! जब सरकार को यह पता चला कि आजाद की माँ की मूर्ती तैयार की जा चुकी है और सदाशिव राव, रूपनारायण, भगवान् दास माहौर समेत कई क्रांतिकारी झांसी की जनता के सहयोग से मूर्ती को स्थापित करने जा रहे है तो उसने अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापना को देश, समाज और झाँसी की कानून व्यवस्था के लिए खतरा घोषित कर उनकी मूर्ति स्थापना के कार्यक्रम को प्रतिबंधित कर पूरे झाँसी शहर में कर्फ्यू लगा दिया ! चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात कर दी गई ताकि अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति की स्थापना ना की जा सके !

तत्कालीन सरकार के इस राक्षसी स्वरूप के खिलाफ आज़ाद के अभिन्न सहयोगी सदाशिव जी ने ही कमान संभाली थी और चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति अपने सिर पर रखकर इस ऐलान के साथ कर्फ्यू तोड़कर अपने घर से निकल पड़े थे कि यदि चंद्रशेखर आज़ाद ने मातृभूमि के लिए अपने प्राण बलिदान कर दिए थे तो आज मुझे अवसर मिला है कि उनकी माताश्री के सम्मान के लिए मैं अपने प्राणों का बलिदान कर दूं !

अपने इस ऐलान के साथ आज़ाद की माताश्री की मूर्ति अपने सिर पर रखकर पीठ की तरफ चल दिए सदाशिव जी के साथ झाँसी के राष्ट्रभक्त नागरिक भी चलना प्रारम्भ हो गए थे ! अपने आदेश की झाँसी की सडकों पर बुरी तरह उड़ती धज्जियों से तिलमिलाई तत्कालीन राक्षसी सरकार ने अपनी पुलिस को सदाशिव जी को गोली मार देने का आदेश दे डाला था किन्तु आज़ाद की माताश्री की प्रतिमा को अपने सिर पर रखकर पीठ की तरफ बढ़ रहे सदाशिव जी को जनता ने चारों तरफ से अपने घेरे में ले लिया था अतः सरकार ने उस भीड़ पर भी गोली चलाने का आदेश दे डाला था ! परिणामस्वरूप झाँसी की उस निहत्थी निरीह राष्ट्रभक्त जनता पर तत्कालीन नृशंस सरकार की पुलिस की बंदूकों के बारूदी अंगारे मौत बनकर बरसने लगे थे सैकड़ों लोग घायल हुए, दर्जनों लोग जीवन भर के लिए अपंग हुए और तीन लोग मौत के घाट उतर गए थे !

तत्कालीन राक्षसी सरकार के इस खूनी तांडव का परिणाम यह हुआ था कि चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित नहीं हो सकी थी और आते जाते अनजान नागरिकों की प्यास बुझाने के लिए उनकी स्मृति में बने प्याऊ को भी पुलिस ने ध्वस्त कर दिया था !

अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की 2-3 फुट की मूर्ति के लिए उस देश में 5 फुट जमीन भी देने से तत्कालीन यमराजी सरकार ने इनकार कर दिया था जिस देश के लिए चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे !

एक और कहाँ चन्द्र शेखर आजाद, उनकी माँ जगरानी देवी, सदाशिव मलकापुरकर, मास्टर रूपनारायण, भगवान् दास माहौर एवं झांसी की जनता वहीँ दूसरी और भावरा गाँव, वहाँ का समाज और तत्कालीन सरकार ! आज भी हमारा समाज दो भागों में बंटा दिखाई देता है, लोग दो तरफ खड़े हुए है !

इस कहानी से देश के सभी लोगों को विशेषकर आज की नौजवान पीढ़ी के हर सदस्य को परिचित होना चाहिए ! क्योंकि वर्षों से कुटिलता और कपट के साथ सत्ताधीशों ने अपने राक्षसी कारनामों को हमसे आपसे छुपाकर रखा है और इतने वर्षों से हमे सिर्फ यह समझाने की कोशिश की गई है कि देश की आज़ादी का इकलौता ठेकेदार परिवार विशेष ही है !

संदर्भ : Indian Revolutionaries: A comprehensive study 1757-1961, Volume 3

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