#choselose

समाधान क़िस्त 2

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मित्र राकेश सैनी की ओर से साभार प्राप्त।
गुलाम कौमों की सबसे बड़ी विशेषता ये होती है कि वो अपनी खुद की विरासत , सभ्यता संस्कृति और इतिहास से शर्मिंदा रहता है । हीन भावना से ग्रस्त रहता है और अपने मालिक अपने आक्रांता की हर चीज़ से प्रभावित होता है । उसकी नकल करना चाहता है ।

पिछले दिनों बंगलुरू जाना हुआ । वहां एक मित्र के घर रुका । उनकी छोटी बहन अमरीका में रहती हैं । छुट्टियों में घर आई हुई थीं । बातों -बातों में बताने लगी कि अमरीका में बहुत गरीब मजदूर वर्ग McDonald , KFC और Pizza Hut का burger पिज़्ज़ा और chicken खाता है ।
अमरीका और यूरोप के रईस धनाढ्य करोड़पति लोग ताज़ी सब्जियों उबाल के खाते हैं , ताज़े गुंधे आटे की गर्मा गर्म रोटी खाना बहुत बड़ी समृद्धि का लक्षण है । ताज़े फलों और सब्जियों का सलाद वहां पैसेवालों को ही नसीब होता है …….. ताजी हरी पत्तेदार सब्जियां अमीर लोग ही खा पाते हैं । गरीब लोग पैकेज्ड फूड खाते हैं ।

हफ़्ते / महीने भर का राशन अपने तहखानों में रखे डीप फ्रीजर में रख लेते हैं और उसी को माइक्रोवेव में गर्म कर कर के खाते रहते हैं ।

आजकल भारतीय शहरों के नव धनाढ्य लोग अपने बच्चों का हैप्पी बड्डे मकडोनल में मनाते हैं । उधर अमरीका में कोई ठीक- ठाक सा मिडल क्लास आदमी मैकडॉनल्ड्स में अपने बच्चे का जन्मदिन मनाने की सोच भी नहीं सकता ……… लोग क्या सोचेंगे ?

इतने बुरे दिन आ गए ? इतनी गरीबी आ गयी कि अब बच्चों का हैप्पी बड्डे मैकडोनल्ड में मनाना पड़ रहा है ?

भारत का गरीब से गरीब आदमी भी ताजी सब्जी , ताजी उबली हुई दाल भात खाता है ……… ताजा खीरा- ककड़ी खाता है ।

अब यहां गुलामी की मानसिकता हमारे दिल दिमाग़ पे किस कदर तारी है ये इस से समझ लीजिये कि यूरोप, अमरीका हमारी तरह ताज़ा भोजन खाने को तरस रहा है और हम हैं कि फ्रिज में रखा बासी पैकेज्ड फूड खाने को तरस रहे हैं ।

अमरीकियों की समृद्धि जो हमें सहज उपलब्ध है हम उसे भूल उनकी दरिद्रता अपनाने के लिए मरे जाते हैं ।

ताज़े फल -सब्जी खाने हो तो फसल चक्र के हिसाब से दाम घटते -बढ़ते रहते है ।
इसके विपरीत डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों के दाम साल भर स्थिर रहते हैं बल्कि समय के साथ सस्ते होते जाते हैं । जैसे- जैसे एक्सपायरी तिथि नज़दीक आती जाती है , डिब्बाबंद भोजन सस्ता होता जाता है और एक दिन वो भी आ जाता है कि स्टोर के बाहर रख दिया जाता है , लो भाई ले जाओ , मुफ्त में ।

हर रात 11 बजे स्टोर के बाहर सैकड़ों लोग इंतज़ार करते हैं ……. एक्सपायरी तिथि वाले भोजन का ।

133 करोड़ लोगों की विशाल जनसंख्या का हमारा देश आज तक किसी तरह ताज़ी फल- सब्जी भोजन ही खाता आया है ।
ताज़े भोजन की एक तमीज़ तहज़ीब होती है । ताज़े भोजन की उपलब्धता का एक चक्र होता है । ताज़ा भोजन समय के साथ महंगा -सस्ता होता रहता है । आजकल समाचार माध्यमों में टमाटर और हरी सब्जियों के बढ़ते दामों को लेकर जो चिल्ल पों मची है वो एक गुलाम कौम का विलाप है …….. जो अपनी ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत को भूल अपनी गुलामी का विलाप कर रही है ।

भारत बहुत तेज़ी से ताजे भोजन की समृद्धि को त्याग डिब्बेबन्द भोजन की दरिद्रता की ओर अग्रसर है ।

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